Tuesday, 29 September 2015

मेरे इस ज़िद की चाय में
मुहब्बत का शक्कर तो तुमने ही घोला है I
तुम्हारे इस मीठी महक का लिहाफ ओढ़
एक सांवली सी स्याही मेरे रूह को धीमे से रंग रही हैI

कि फूंक के पीयू तुम्हारी गर्मी को
ऐसा फैसला इन होटों ने किया ना था I
कि जल जाये वह तुम्हारी हलकी चाहत में
ऐसा मेरे जिस्म के धुंए का हिसाब ना थाI

इस ज़िद के प्याले में ही तो
मेरे साहिल का किनारा झलकता है I
तुम्हारी आँखों की नज़्म को चख के ही तो
मैंने इस ज़िद के रस को घोला है I

बस इतनी सी नुमाइश है तुम्हारी मिठास से
कि तीखी सी सर्दियों में मेरे होठों से लिपटी रह जाये I
बस इतनी सी नुमाइश है तुम्हारे इश्क़ के चम्मच से
कि मेरे इस ज़िद कि चाय में डूबा सा रह जाये I  
  

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